what is motivation in hindi- प्रेरणा, प्रोत्साहन या अभिप्रेरण क्या है?

हेल्लो दोस्तों आज के इस पोस्ट में आपको motivation in hindi  के बारे में बताया गया है की क्या होता है कैसे काम करता है तो चलिए शुरू करते है

प्रेरणा, प्रोत्साहन या अभिप्रेरण (Motivation)

“किसी व्यक्ति की वो भावनायें अथवा इच्छायें, जो उसे किसी कार्य को करने के लिए प्रेरित करती हैं,” “अभिप्रेरण” या “प्रोत्साहन” कहलाती है। – दूसरे शब्दों में “प्रोत्साहन एक प्रेरणा स्रोत है जिससे अमुक व्यक्ति में कार्य करने की तीव्र इच्छा शक्ति जागृत होती है और वह अपनी सामर्थ्य और शक्ति का प्रयोग करके व्यापार अथवा उपक्रम के लक्ष्यों और उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए सहयोग करता है।”

प्रोत्साहन किसी एक व्यक्ति को मानसिक तौर पर तैयार और क्रियाशील बनाता है और संगठन के लिए अमुक कार्य करने की इच्छा जागृत करता है।

डाल्टन एम्सफारलैण्ड (Dalton Emsfarland) के अनुसार, “प्रोत्साहन की संकल्पना मुख्यतः मानसिक है। इसका सम्बन्ध उन शक्तियों से है जो किसी के अन्दर होती है और उसे किसी कार्य को करने अथवा न करने के लिए उकसाती हैं।”

माइकल जे० जसियस (Michael J. Jucius) के अनुसार, “प्रोत्साहन किसी व्यक्ति को प्रेरणा देने का कार्य है जो वाँछित क्रिया करने के लिए उकसाता है, वाँछित क्रिया पाने के लिए सही बटन दबाता है।”

बीच (Brech) के अनुसार, “प्रोत्साहन एक प्रेरणा है जो टीम के सदस्य को अपना कार्य प्रभावशाली ढंग करने को प्रेरित करती है, अपनी टीम को ईमानदारी के साथ लक्ष्य प्राप्ति के लिए सहयोग करता है और संगठन में अपना कार्य प्रभावी ढंग से करता है।”

केरोल शर्टल (Caroll Shartle) के मतानुसार, “किसी निर्धारित लक्ष्य की प्राप्ति के लिए अथवा किसी निर्दिष्ट दिशा में गतिशील होने के लिए प्रदान की जाने वाली प्रेरणा को ही “अभिप्रेरण” कहते हैं।”

प्रोत्साहन और नेतृत्व किसी उपक्रम के प्रबन्धन में सफलता की कुंजी है। ये मानव संसाधनों के विकास के लिए भी उत्तरदायी है। प्रोत्साहन किसी व्यक्ति को कोई कार्य करने के लिए उकसाता है। लोकतंत्रीय नेतृत्व वित्तीय और गैर वित्तीय प्रोत्साहनों के द्वारा कर्मचारी के प्रोत्साहन पर बहत निर्भर करता है। प्रोत्साहन प्रायः श्रमिक के वेतन से अतिरिक्त होते हैं तथा उत्पादन में उसके अपने योगदान के अनुपात में होता है।

प्रोत्साहन के मूल तत्व (Fundamentals of Motivation)

प्रोत्साहन का प्रथम मूल तत्व यह है कि प्रत्येक व्यक्ति जिंदा रहना चाहता है और कार्य करना चाहता है। इसके लिए वह जीवन की आधारभूत आवश्यकतायें जैसे रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा एवं चिकित्सा सुविधा आदि चाहता है।

प्रोत्साहन का दूसरा मूल तत्व यह है कि प्रत्येक व्यक्ति अपनी संतुष्टि एवं प्रसिद्धि के लिए लक्ष्य प्राप्त करना चाहता है। यदि व्यक्ति को उसकी आवश्यकताओं को पूर्ति के लिए आश्वस्त कर दिया जाये तो वह अपना कार्य मन लगाकर करेगा।

व्यक्ति की आवश्यकताओं में मानसिक, सामाजिक, सुरक्षा तथा अहम अथवा आत्मसम्मान भी सम्मिलित है।

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 प्रोत्साहनों का वर्गीकरण (Classification of Motivation) 

प्रोत्साहनों को उनकी प्रकृति के आधार पर निम्नलिखित वर्गों में बाँटा जा सकता है।

  1. आन्तरिक तथा बाह्य प्रेरणा (Internal and external motivation)
  2. सकारात्मक तथा नकारात्मक प्रेरणा (Positive and negative motivation)

आन्तरिक प्रेरणा मनुष्य के अन्दर से उत्पन्न होती है और यह एक मनोवैज्ञानिक पहलु है। मनुष्य की आन्तरिक इच्छायें उसे कार्य करने के लिए प्रेरित करती है। वह अपना लक्ष्य और प्रसिद्धि पाना चाहता है।

बाह्य प्रेरणा वेतन, भत्ते, पुरस्कार, प्रशंसा, पद, अधिकार आदि द्वारा प्राप्त होती है।

संतुष्ट व्यक्ति की सोच सदैव सकारात्मक होती है और यह संगठन के उद्देश्यों की पूर्ति के लिए समर्पित रहता है। संतुष्ट व्यक्ति के पास अच्छा पद, अच्छा वेतन, अधिक अधिकार व जिम्मेदारियाँ होती हैं।

असंतुष्ट व्यक्ति की सोच सदैव नकारात्मक होती है। वह अपने काम दिमाग लगाने के स्थान पर कुछ भयभीत और चिड़चिड़ा सा रहता है। उसे वर्तमान नौकरी खोने, पदावनत होने अथवा वेतन कम होने का भी भय रहता है।

 प्रोत्साहन का महत्व (Importance of Motivation) 

प्रोत्साहन कार्य के प्रति लगाव उत्पन्न करने, उत्साही बनने, पहल करने, ईमानदारी तथा इच्छाशक्ति जागृत करने के लिए आवश्यक है। इस प्रकार प्रोत्साहन उत्पादकता को बढ़ावा देता है। प्रोत्साहन के महत्व को निम्न बिन्दुओं से स्पष्ट किया जा सकता है1

1.कार्य की इच्छा जाग्रत करना (Arouse Desire to Work)-कोई व्यक्ति किसी कार्य को करने में सक्षम हो सकता है, उसमें आवश्यक कुशलता और दक्षता हो सकती है। फिर भी वह अपना कार्य समय पर नहीं कर पाता है। सही मात्रा में तथा सही क्वालिटी का उत्पादन नहीं कर पाता है, यदि वह असंतुष्ट है। प्रोत्साहन उसकी असंतुष्टी को समाप्त करके कार्य की इच्छा जागृत करता है और उसे मानसिक रूप से कार्य के लिए तैयार करता है।

2.उत्पादन के कारकों का सही प्रयोग (Appropriate Use of Factors of Production)-किसी उपक्रम में अच्छ उपकरण, मशीनें, औजार और पर्याप्त मात्रा में कच्चा माल हो सकता है परन्तु सही प्रोत्साहन एवं प्रेरणा के उनका प्रभावी ढंग से उपयोग नहीं हो पाता है।

3.कर्मचारी के फेरबदल में कमी (Reduction in Labour Turnover)-अगर कर्मचारी को उचित प्रोत्साहन मिलया तो वह संगठन छोड़कर दूसरे संगठन में नहीं जायेगा और इस प्रकार कर्मचारी के फेरबदल में कमी आयेगा।

4.समन्वय का आधार (Basis of Co-operation)-प्रोत्साहन से कर्मचारी की संतुष्टि होती है। उसकी लगन और ईमानदारी संगठन के हित में कार्य करती है। इससे समन्वय का आधार बनता है।

5.उत्पादन एवं उत्पादकता में वृद्धि (Increase on Production & Productivity)-प्रोत्साहन से कार्य करने की इच्छा होती है। इससे उत्पादन एवं उत्पादकता को बढ़ावा मिलता है। प्रोत्साहन के अभाव में कर्मचारी अपनी ड्यूटी से गैरहाजिर (Absent) रहता है, उत्पादन की मात्रा तथा क्वालिटी म आती है तथा आये दिन कर्मचारी अलट-पलट करने पड़ते हैं।

 अच्छी प्रोत्साहन प्रणाली की आवश्यकताएँ (Essentials of Sound Motivation System)

अच्छी प्रोत्साहन प्रणाली की निम्न आवश्यकताएँ होती हैं

  1. अच्छा वेतन (Good Wages)-किसी कर्मचारी के लिए मुख्य आकर्षण उसका वेतन होता है। यह उसकी मलभात आवश्यकताओं की पूर्ति करता है। अत: समय-समय वेतन का निर्धारण होना आवश्यक है।
  2. अच्छी वित्तीय प्रोत्साहन प्रणाली (Good Financial Incentive Scheme)-अच्छे वित्तीय प्रोत्साहन से कर्मचारी को अच्छा और अधिक कार्य करने की प्रेरणा मिलती है।
  3. अवसर (Opportunity)-कर्मचारी को लक्ष्य प्राप्ति, वृद्धि तथा पदोन्नति का अवसर मिलना चाहिए।
  4. मानवीय सम्बन्ध (Human Relations)-प्रबन्धन को अच्छे मानवीय सम्बन्ध स्थापित करने चाहिए तथा अच्छे कार्यों के लिए सराहना करनी चाहिए।
  5. अच्छी कार्यकारी दशाएँ (Good Working Conditions)-अच्छी कार्यकारी दशाओं से कर्मचारी का मनोबल बढ़ता है तथा कार्य के प्रति आकर्षण बढ़ता है।
  6. कार्य की सुनिश्चितता (Job Security)-कर्मचारी के मन में अपने जॉब के जाने का भय नहीं होना चाहिए। इससे कार्य के प्रति समर्पण की भावना उत्पन्न होती है।
  7. कार्य की संतुष्टि (Job Satisfaction)-कोई कर्मचारी जितना दक्ष एवं कुशल है, उसी के अनुरूप उससे कार्य कराया जाये तथा कार्य करने का अवसर, अधिकार एवं चुनौती दी जाये तो उसका कार्य के प्रति आकर्षण बढ़ेगा तथा उसे अपने कार्य से संतुष्टि होगी।

प्रोत्साहन को प्रभावित करने वाले कारक (Factors Affecting Motivation)

(a) प्रोत्साहित करने वाले कारक :

(i) उपलब्धियाँ (Achievement)-कार्य की सफलतापूर्वक समाप्ति कर्मचारी को व्यक्तिगत संतोष देती है।

(ii) विकास (Development)-नये कौशल सीखने का मौका, जो उन्नति के अच्छे अवसर प्रदान करेगा।

(ifi) उन्नति (Advancement)-पदोन्नति से कर्मचारी के मनोबल एवं आत्मविश्वास को बढ़ावा मिलता है।

 (iv) पहचान (Recognition)-अच्छा कार्य करने से संगठन में अपनी पहचान बनती है।

(v) दायित्व और अधिकार (Responsibility and Authority)-कर्मचारी को अपने कार्य से सम्बन्धित दायित्वों और अधिकारों का प्रयोग करके अपार संतोष एवं सुख मिलता है।

(vi)कार्य (Work) कार्य से सम्बन्धित सकारात्मक घटक कामगार को प्रोत्साहित तथा नकारात्मक घटक हतोत्साहित करते हैं।

 (b) हतोत्साहित करने वाले कारक 

(i) वेतन (Salary)-उचित वेतन एवं भत्ते न मिलने की स्थिति में कामगार हतोत्साहित होता है।

(ii) पद (Post or Status)-व्यक्ति को उचित पद तथा उससे जुड़े लाभ न मिलने से भी उसके मन में अंसतोष की भावना उत्पन्न होती है।

(iii) कम्पनी की नीतियाँ (Company Policies)-कम्पनी की गलत नीतियाँ एवं पक्षपातपूर्ण रवैया भी कामगार हो हतोत्साहित करता है।

(iv) कार्यकारी दशाएँ (Working Conditions)-कार्यकारी दशाएँ अगर उचित न हो, वातावरण दूषित हो, बिजली पानी की उचित व्यवस्था न हो तो भी कर्मचारी हतोत्साहित होता है।

 (v) समन्वय न होना (No Coordination)-कम्पनी में अपने अधिकारियों एवं अधीनस्थों के साथ उचित समन्वय न होने से भी कर्मचारी हतोत्साहित होता है।

(vi) व्यक्तिगत परेशानियाँ (Personal Problem)-व्यक्तिगत परेशानियाँ भी कर्मचारी के उत्साह में कमी लाती है।

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reference-https://en.wikipedia.org/wiki/Motivation

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