what is visual display unit in hindi-विसूअल डिस्प्ले यूनिट क्या है?

हेल्लो दोस्तों आज के इस पोस्ट में आपको what is visual display unit in hindi के बारे में बताया गया है की क्या होता है कैसे काम करता है तो चलिए शुरू करते है

विजुअल डिस्प्ले यूनिट (Visual Display Unit VDU)

यह हमारे माइक्रो-कम्प्यूटर से सम्बन्धित होता है और जब हम कार्य कर रहे होते है तो उसी  क्षण हमारे द्वारा किए गए कार्य को दिखाता भी है। यह हमारे कम्प्यूटर की एक window भी जैसे ही किसी पाठयांश को की-बोर्ड पर अंकित करते हैं, वैसे ही वह कम्प्यूटर की मैमोरी में होता है और उसका अक्स हमें स्क्रीन पर दिखाई देता है। हमारे कम्प्यूटर के लिए विभिन्न प्रकार स्क्रीन बाजार में उपलब्ध हैं।

मॉनीटर कम्प्यूटर का डिस्प्ले यूनिट होता है। जो की प्लास्टिक के केस में बन्द सम्पूर्ण डिस्प्ले यूनिट को हर मॉनीटर कहते हैं। व्यवहारिक तौर पर मॉनीटर, डिस्प्ले तथा स्क्रीन को हम की ही तौर पर लेते हैं। मॉनीटर की विजुअल डिस्प्ले यूनिट (Visual Display Unit VDU) भी कहते हैं। मॉनीटर user को टेकस्ट तथा ग्राफिक्स दिखाता है। इसमें अलग-अलग तकनीक का प्रयोग होता है। जैसे कि

(i) कैथोड रे ट्यूब (Cathode Ray Tube CRT)

(ii) लिक्विड क्रिस्टल डिस्प्ले (Liquid Crystal Display)

 (iii) लाइट इमीटिंग डायोड (Light Emitting Diode LCD)

(iv) गैस प्लाज्मा (Gas Plasma)

अधिकांश कम्प्यूटर डिस्प्ले चित्र की निर्माण प्रक्रिया में एनालॉग सिग्नल का इनपुट लेते हैं। मॉनीटर का सबसे महत्त्वपूर्ण अंग पिक्चर ट्यूब होता है जिसे हम कैथौड रे ट्यूब (CRT : Cathode Ray Tube) कहते हैं। स्क्रीन पर दिखाई देने वाला चित्र CRT ही बनाता है। अच्छे मॉनीटर में हमेशा ही अच्छा CRT होगा। खराब CRT वाला मॉनीटर हमेशा ही खराब परिणाम देगा तथा इसमें कोई भी उपाय विशेष अन्तर नहीं ला सकता वास्तव में मॉनीटर तथा CRT एक-दसरे से इतना करीब से जुड़ हैं कि मॉनीटर को कई बार सिर्फ CRT ही कहा जाता है।

एनालॉग तथा डिजिटल CRT

आज दिखाई देने वाले लगभग सभी मॉनीटर एनालॉग होते हैं जबकि पुराने डिजिटल होते थे। यह थोड़ा दुविधाजनक(indecisive) होता है-आखिरकार कम्प्यूटर मुख्यत: डिजिटल डाटा ही पढते हैं। ऐसे में मानिटर एनालॉग कहना विरोधाभाषी लगता है। बावजूद इसके हकीकत ये है कि मॉनीटर वाकई में एनालाग है। और उसे नियन्त्रित करने वाला सर्किट डिजिटल होता है।

अब भी समस्या है? तो इसे इस तरह देखें

C.P.U. मॉनीटर तक डाटा की यात्रा चरणों(step) में होती है।

(i)बस (BUS) से वीडियों चिपसैट (Video Chipset)-जहाँ उसे प्रोसेस किया जाता है उसे डिजिटल डाटा (Digital Data)

 (ii) वीडियों चिपसैट से वीडियो मैमोरी (Video Memoयहाँ पर स्क्रीन पर प्रतिबिम्ब (collect)संग्रहित किया जाता है। डिजिटल डाटा (Digital Data)

(iii)वीडियों मैमोरी से डिजिटल एनालॉग कन्वर्टर (Digital Analog Converter-DAC)

यहाँ पर स्क्रीन का प्रतिबिम्ब पढ़कर मॉनीटर के लिए परिवर्तित किया जाता है। (डिजिटल डाटा)

(iv)डिजिटल एनालॉग कन्वर्टर से मॉनीटर तक। एनालॉग डाटा (Analog Data)

जैसा हमने देखा, प्रथम तीन चरणों में डाटा डिजिटल ही था परन्तु चतुर्थ चरण में अर्थात् मॉनीटर में प्रवेश करने पर उसका एनालॉग प्रारूप हो गया। इस कारण से हम आज के अधिकांश मॉनीटरों को एनालॉग(analog) कहते हैं। आरम्भ में मॉनीटर डिजिटल कलर सिग्नल(signal) देते थे। इसका अर्थ यह है कि प्रत्येक कलर के लिए कुछ पूर्व निर्धारित कलर के स्तर थे। यह CGA और EGA वीडियो कार्ड में लागू होता था। डिजिटल वीडियो सिग्नल को TTL भी कहते हैं। अर्थात् ट्रॉजिस्टर-ट्रॉजिस्टर लॉजिक (Transistor to Transistor Logic)!

इसे भी जाने –

IBM के VGA कार्ड लॉन्च करने से डिजिटल छोड़कर एनालॉग की दुनिया में प्रवेश किया गया। जैसा कि हम जानते हैं एनालॉग सिग्नल के लिए वैल्यू की रेंज होती है। इस कारण एनालॉग सिग्नल में विभिन्न कलर के स्तर की संख्या बहुत बढ़ जाती है। व्यावहारिक तौर पर, एनालॉग कलर के लिए 256 विभिन्न कलर वैल्यू का प्रयोग करता है। इस तरह हमारे पास कुल 16.7 मिलियन विभिन्न कलर की उपलब्धता हो जाती है।

आधुनिक मॉनीटर तथा वीडियों कार्ड एनालॉग सिग्नल का प्रयोग करते हैं सन् 1980 उत्तरार्द्ध में नए एनालॉग VGA Card आए थे। पुराने डिजिटल आधारित CGAYEGA कार्ड भी मार्केट में चल रहे थे, अत: कुछ कम्पनियों ने ऐसे मॉनीटर बनाए जो कि एनालॉग तथा डिजिटल, दोनों सिग्नल पर चल सकते थे। इनके पीछे एक स्विच था जिससे हम डिजिटल या एनालॉग सिग्नल पर चलते हैं। यह VGA, SVGa तथा अन्य नवीनतम कार्ड की आवश्यकता भी है।

आकार(size)

आकार को स्क्रीन के आर-पार विकर्णत: नापा जाता है। आमतौर पर 14, 15, 17, तथा 21 इंच के मॉनीटर उपलब्ध हैं। बड़े साइज के मॉनीटर ज्यादा महँगे होते हैं तथा यह डेस्कटॉप पब्लिशिंग, ग्राफिक्स या बड़ी स्प्रेडशीट को काम करने के लिए उपयुक्त हैं। निर्माता प्राय: मॉनीटर की पिक्चर ट्यूब के एक कोने से दूसरे कोने के नाम को ही दर्शाते हैं। यह असल दिखाई देने वाले क्षेत्र से अधिक होता है।

इसका कारण यह है कि मॉनीटर पर एक प्लास्टिक का केस भी होता है। इस कारण वास्तव में दिखाई देने वाला area कुछ कम हो जाता है। अत: इस साइजल का निर्णय लेते वक्त वास्तविक दिखाई देने वाला साइज ही सर्वोपरि होना चाहिए-पिक्चर ट्यूब का कोने से कोने का माप अपनी जगह होती है। 16 इंच या उससे अधिक साइज का मॉनीटर को हम “फूल पेज मॉनीटर” कहते हैं।

रिजोल्यूशन (Resolution)

यह बताता है कि मॉनीटर के पिक्सल (Pixel) कितने पास-पास है। आमतौर पर अधिक पिक्स(px) होने से भी चित्र अच्छा बनता है। पिक्सल की संख्या अक्सर डॉटस-पर-इंच (DPI-Dots Per inch) में दर्शायी जाती है अधिकांशत: मॉनीटर आज 1024X768 रिजोल्यूशन दिखा सकते हैं और VGA स्टेडर्ड है। कुछ महँगे मॉनीटर 1280×1024 या 1600X1200 भा दिखा सक 2048×1536 सबसे बड़ी रिजोल्यूशन है।

कुछ मॉनीटर स्थिर आवृत्ति के हैं अर्थात् वह सिर्फ एक ही आवृत्ति में इनपुट लेंगे। कई monitor   मल्टी स्कैनिंग होते हैं अर्थात् वह आने वाले सिग्नल की आवृत्ति के अनुसार अपने आपको ढाल लेते है  इसका तात्पर्य ये हैं कि यह चित्रों को अलग-अलग रिजोल्यूशन पर दिखा सकते हैं।

रिफ्रेश दर

डिस्प्ले मॉनीटर को प्रति सेकण्ड कई बार रिफ्रेश करना पड़ता है। रिफ्रेश रेट को सिर्फ हर्टज में पढा जाता है और इसे हम ऊर्ध्वाधर आवृत्ति (Vertical Frequency) या ऊर्ध्वाधर स्कैन दर (Vertical Scan Rate) या ऊर्ध्वाधर रिफ्रेश दर (Vertical Refresh Rate) भी कहते हैं। रिफ्रेश  दर अधिक होने से स्क्रीन पर फ्लिकर (Flicker) कम हो जाती है। इससे आँखों पर बोझ कम पड़ता है

 रिफ्रेश रेट यह बताता है कि एक सेकण्ड में कितनी बार मॉनीटर परे स्क्रीन को (Redraw) करते हैं। पहले  का मापदंड 60 मेगाहर्टज था। आज का नया VESA मापदंड(Criteria )रिफ्रेशर 75 हर्टज पर रख देता है। इसका मतलब यह है कि मॉनीटर पूरे स्क्रीन को एक सेकण्ड में 75 बार बनाता है।

इंटरलेस्ड/नॉन-इंटरलेस्ड मॉनीटर (Interlaced/Non-Interlaced Monitor)

मॉनीटर पर नजर आने वाली पिक्चर बार-बार रिफ्रेश की जाती है। अधिकांशत: मॉनीटर 60 मेगाहर्टज पर प्रत्येक पिक्चर को रिफ्रेश कर सकते हैं। यद्यपि कुछ मॉनीटर लघु रीति का उपयोग करते। हैं तथा एक लाइन छोड़कर रिफ्रेश करते हैं। इससे मॉनीटर 1 सेकण्ड में 60 बार रिफ्रेश तो होगा, परन्तु हर एक पिक्सल की लाइन एक सेकण्ड में 30 बार ही रिफ्रेश होगी। इस प्रक्रिया को हम इंटरलेसिंग कहते हैं।

इंटरलेस्ड मॉनीटर नॉन-इंटरलेस्ड मॉनीटर से सस्ते होते हैं, परन्तु इंटरलेस्ड मॉनीटर से नॉन-इंटरलेस्ड मॉनीटर रिफ्रेश ज्यादा करेंगे। यदि हम लम्बे समय तक स्क्रीन के सामने बैठते हैं तो हमें नॉन-इंटरलेस्ड मॉनीटर लेना चाहिए।

 डॉट पिच (Dot Pitch)

इसे फॉस्फोरस पिच (Phosphorus Pitch) भी कहते हैं. जो मॉनीटर पर 2 डॉट्स के मध्य की दरी है। CRT का स्क्रीन लाल हरे तथा नीले फॉस्फोरस मैटीरियल से बना होता है। हर ऐलिमेंट को हम डॉट पिच कहते हैं। जितना छोटा डॉट पिच कहते है। डॉट पिच से चित्र का (Sharpness) निर्धारित होती है।

जितना छोटा डॉट पिच उतना अच्छा चित्र। इस कारण हम डॉट पिच के मॉनीटर का चुनाव करना चाहिए। डॉट पिच बताता है कि चित्र का बनाने वाले डाट कितने बारीक है यदि हम दो 15 inch के मॉनिटर देखे जिनका डॉट पिच 0.26 तथा 031 मिमी है,तो हम यकीन से कह सकते हैं कि 0.26 मि०मी० वाला मॉनीटर हमें बेहतर चित्र देगा। साधार मॉनीटरों को डॉट पिच भी ज्यादा होता हैं।

reference-https://www2.psych.ubc.ca/~rensink/publications/download/EncycPercept-VisualDisp-rr.pdf

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